सम्पादकीय-लेख

लेख – छत्तीसगढ़ की काशी खरौद

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– अनिल तिवारी
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120 किलोमीटर दूर खरौद में एक दुर्लभ शिवलिंग स्थापित है। जिसे लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस शिवलिंग की इस खासियत के कारण इसकी पहचान दूसरे शिवलिंगों से अलग है। कहा जाता है कि इन छिद्रों में से एक का रास्ता सीधे पाताल तक जाता है। यह मंदिर छठवीं शताब्दी में बनाया गया। रामायण के समय के इस मंदिर में स्थित शिवलिंग में लाखों छिद्र हैं। संस्कृत में लाख को लक्ष कहा जाता है इसलिए इस शिवलिंग का दूसरा नाम लक्षलिंग भी है। ऐसा शिवलिंग खरौद नगर के अलावा और कहीं नहीं है।

कहते हैं इस शिवलिंग के लाखों छिद्र में से एक छिद्र ऐसा भी है जो सीधे पाताल तक जाता है। पाताल जाने वाले इस छिद्र में कितना भी पानी डाला जाए, पानी रुकता ही नहीं है। यहां श्रावण महीने के सोमवार और शिवरात्रि के मौके पर मेला लगता है और काफी भीड़ होती है। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को रावण की हत्या करने पर ब्रह्म हत्या का पाप लग चुका था। इस पाप से मुक्ति के लिए वे रामेश्वर में शिवलिंग स्थापित करके पूजा करना चाहते है। लक्ष्मणजी को सभी प्रमुख तीर्थो से जल लाने का कार्य दिया गया। जब लक्ष्मण जी गुप्त तीर्थ शिवरीनारायण से जल लेकर लौटने रहे थे तो वे बीमार हो गए। भाई राम के पास समय पर पहुंचने उन्होंने शिवलिंग स्थापित कर शिवजी की पूजा की। उनकी पूजा से खुश होकर शिवजी ने उन्हें दर्शन दिए और यह शिवलिंग लक्ष्मणेश्वर के नाम से मशहूर हुआ। बाद में राजा खड्गदेव ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। बताया जाता है कि यह मंदिर छठी शताब्दी का बना हुआ है । मंदिर के बाहर राजा खड्गदेव और उनकी पत्नी की हाथ जोड़े हुए मूर्ति भी है । रामायण काल में श्री राम ने इस जगह दो राक्षस खर और दूषण का वध किया था, इस कारण इस जगह का नाम खरौद पड़ा। इस मंदिर में चारों ओर पत्थर की मजबूत दीवार है। इस दीवार के अंदर 110 फीट लंबा और 48 फीट चौड़ा चबूतरा है, जिसके ऊपर 48 फुट ऊंचा और 30 फुट गोलाई में मंदिर स्थित है। चबूतरे के ऊपरी भाग को परिक्रमा कहते हैं। सभा मंडप के सामने के हिस्से में सत्यनारायण मंडप, नन्दी मंडप और भोगशाला हैं। मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही सभा मंडप मिलता है। इसके दक्षिण और बायां तरफ एक-एक शिलालेख है। दक्षिण तरफ के शिलालेख की भाषा साफ नहीं है इसलिए इसे पढ़ा नहीं जा सकता। मंदिर के बाएं हिस्से का शिलालेख संस्कृत भाषा में है। इसमें 44 श्लोक हैं। रत्नपुर के राजाओं का जन्म चन्द्रवंशी हैहय वंश में हुआ था। उनके बनाए कई मंदिर, मठों और तालाबों के निर्माण कराने का उल्लेख इस शिलालेख में है। बताया जाता है कि रत्नदेव(III) की राल्हा और पद्मा नाम की दो रानियाँ थीं। राल्हा से सम्प्रद और जीजाक नाम के दो बेटे थे। पद्मा के बेटे खड्गदेव रत्नपुर के राजा हुए। जिन्होंने लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इससे पता चलता है कि मंदिर 8वीं शताब्दी तक जीर्ण हो चुका था। इस आधार पर कुछ विद्वान इसे छठवीं शताब्दी का मानते हैं। मूल मंदिर के प्रवेश द्वार के पास कलाकृति से सजे 2 पत्थर के स्तम्भ हैं। इनमें से एक स्तम्भ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन और अर्द्धनारीश्वर के दृश्य खुदे हुए हैं। इसी प्रकार दूसरे स्तम्भ में राम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे राम-सुग्रीव मित्रता, बाली का वध, शिव तांडव और सामान्य जीवन से सम्बंधित एक बच्चे के साथ स्त्री-पुरूष और दंडधरी पुरुष खुदे हैं। प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्ति है। उनके पीछे दो नारी प्रतिमाएं हैं। इसके नीचे द्वारपाल जय और विजय की मूर्ति है।
– (लेखक के IBC24 के असिस्टेंट एडिटर हैं)


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