



बिलासपुर. सिम्स बिलासपुर के आडिटोरियम में आयोजित दो दिवसीय राजभाषा आयोग के नौंवे वार्षिक अधिवेशन में जांजगीर-चांपा जिले के समन्वयक सुरेश पैगवार के नेतृत्व में जिले भर से वरिष्ठ एवं कनिष्ठ साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इस अवसर पर जांजगीर से वरिष्ठ कवि संतोष कश्यप, प्रमोद आदित्य, भैया लाल नागवंशी, रवि दिवाकर, सुश्री लक्ष्मी करियारे, सूरज श्रीवास, श्रीमति चन्द्रकिरण सोनी, डॉ. चन्द्रशेखर खरे, राजेश सिंह क्षत्री, पंकज यादव, चांपा से डॉ. रमाकांत सोनी, संतोषी श्रद्धा महंत, अकलतरा से रमेश सोनी, अपर्णा शर्मा, कन्हाईबंद से उमाकांत टैगोर, कोटमीसोनार से व्यास सिंह गुमसुम, दशरथ मतवाले, कचंदा से संतोष प्रधान, हजारी कुर्रे खोखरा, पामगढ़ से उमेश कुमार, विदेश्वरी बंजारे आदि ने अपनी सहभागिता निभाई। मंच से जांजगीर चांपा जिले के कवियों की प्रस्तुति पर सभागार में उपस्थित साहित्यकारों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनकी हौसला अफजाई की।
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय नौवें प्रांतीय सम्मेलन का समापन छत्तीसगढ़ी भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में यथाशीघ्र स्थान दिलाने के दृढ़ संकल्प के साथ हुआ। सम्मेलन के दौरान विभिन्न विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ, जिसमें छत्तीसगढ़ी की भाषाई समृद्धि, प्रशासनिक उपयोगिता तथा साहित्यिक परंपरा पर विशेष प्रकाश डाला गया।
सम्मेलन के सातवें सत्र में “छत्तीसगढ़ी भाषा का स्थानीय बोलियों के साथ अंतर्संबंध” विषय पर केंद्रित चर्चा हुई। वक्ताओं ने बल दिया कि छत्तीसगढ़ की विविध स्थानीय बोलियाँ छत्तीसगढ़ी को और अधिक सशक्त एवं समृद्ध बनाती हैं। डॉ. सुधीर पाठक ने सरगुजिया, रुद्र नारायण पाणिग्रही ने हल्बी तथा डॉ. ईशाबेला लकरा ने कुडुख भाषा की विशेषताओं एवं छत्तीसगढ़ी से उनके गहन संबंधों पर शोधपरक प्रकाश डाला। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. राघवेंद्र कुमार दुबे ने की, जबकि डॉ. विनय कुमार पाठक विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
आठवें सत्र में “प्रशासनिक कार्य-व्यवहार में छत्तीसगढ़ी” विषय पर महत्वपूर्ण संगोष्ठी आयोजित की गई। न्यायमूर्ति श्री चन्द्रभूषण वाजपेयी की अध्यक्षता में संचालित इस सत्र में डॉ. अरविंद तिवारी, अशोक तिवारी, श्री भागवत जायसवाल, अरविंद मिश्र एवं सुधाकर बोदले ने अपने विचारपूर्ण आलेख प्रस्तुत किए। सभी विशेषज्ञों ने एकमत से यह निष्कर्ष निकाला कि जनसामान्य तक शासन-प्रशासन को सुलभ एवं संवेदनशील बनाने के लिए शासकीय कार्यों में छत्तीसगढ़ी भाषा का व्यापक प्रयोग आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
नौवें सत्र का मुख्य केन्द्रबिंदु “छंद विधा में छत्तीसगढ़ी” रहा। श्री अरुण कुमार निगम की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में चोवाराम वर्मा, श्रीमती आशा देशमुख, डॉ. सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, बलराम चन्द्राकर एवं मनीराम साहू ‘मितान’ ने छत्तीसगढ़ी काव्य में छंदबद्ध रचना की समृद्ध परंपरा एवं उसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर विस्तृत प्रकाश डाला। वक्ताओं ने छंदों के तकनीकी पक्षों की जानकारी देते हुए छत्तीसगढ़ी साहित्य को और अधिक परिष्कृत एवं वैश्विक स्तर पर स्थापित करने पर बल दिया।
सम्मेलन के दसवें एवं समापन सत्र में ‘खुला मंच’ आयोजित किया गया, जिसमें प्रदेश भर से पधारे साहित्यकारों, भाषाप्रेमियों एवं विद्वानों ने छत्तीसगढ़ी के विकास एवं संवर्धन हेतु अपने मूल्यवान सुझाव साझा किए। इस अवसर पर राज्य के सभी जिला समन्वयकों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया।
समारोह का विशेष आकर्षण छत्तीसगढ़ी हायर सेकेंडरी स्कूल, पाली की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत जीवंत छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य रहा, जिसने अपनी ऊर्जा, रंग और लय से समस्त उपस्थितजनों का मन मोह लिया।
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग इस संकल्प को लेकर दृढ़ है कि छत्तीसगढ़ी भाषा, जो प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है, को जल्द से जल्द संवैधानिक मान्यता दिलाई जाए।यह आयोजन श्री विवेक आचार्य ,(संचालक, संस्कृति एवं राजभाषा ) के मार्गदर्शन में, डॉ. अभिलाषा बेहार , (सचिव, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग )के निर्देशन में,श्रीमती रुचि शर्मा
अवर सचिव, संस्कृति विभाग की उपस्थिति, डॉ. विनय कुमार पाठक की अध्यक्षता में, डॉ. विवेक तिवारी (जिला समन्वयक) और डॉ. राघवेंद्र दुबे के विशेष सहयोग से बिलासपुर इकाई द्वारा किया गया।






