पौधों से ठीक हो सकता है मानसिक तनाव… रिसर्च में किया गया दावा…देखिए पढ़िए

नई दिल्ली. पौधे, लोगों को जानवरों से काफी अलग दिखते हैं और बहुत से लोगों के लिए उन्हें खुद से अलग समझना आसान हो जाता है और वे इनके महत्व को समझने से चूक जाते हैं। कई लोग फूल और पेड़ों की सुंदरता और उनकी बनावट की तारीफ करते हैं और उन्हें पता है कि प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) जीवन के लिए जरूरी है, लेकिन पौधों से हमारा मानसिक तथा शारीरिक संबंध अपेक्षा से कहीं अधिक गहरा है।



वे ‘स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल’ के स्तर को कम करके मनुष्यों में अवसाद, तनाव और व्यवहार में उतार-चढ़ाव (मूड डिसऑर्डर) के लक्षणों को कम कर सकते हैं। इससे हृदय गति नियंत्रित हो सकती है और मन अच्छा हो सकता है। कई अध्ययनों से पता चला है कि बागवानी (थेरेपी) से कुछ लोग उनके अभिघातजन्य तनाव विकार (पीटीएसडी) लक्षणों से निजात पा सकते है और बेहतर तरीके से जीवन जीने में उन्हें मदद मिल सकती है। जीवंत व प्राकृतिक रंगों से मस्तिष्क को प्रेरणा मिलती है जिससे आपकी रचनात्मकता बढ़ सकती है।

यहां तक ​​कि आपकी मेज पर रखे छोटे पौधों का भी आप पर अधिक प्रभाव पड़ सकता है। आपने अपने घर या कार्यस्थल को रोशन करने के लिए जो घरेलू पौधे खरीदे हैं, वे वास्तव में आपको अधिक स्पष्ट रूप से सोचने में मदद कर सकते हैं। अध्ययनों के अनुसार, पौधों से घिरे होने से आपकी एकाग्रता में 20 प्रतिशत तक सुधार हो सकता है और किसी जानकारी को याद करने की आपकी क्षमता में 15-20 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। पौधे सीओ2 सांद्रता को कम करके और वायु की गुणवत्ता में सुधार करके ऐसा कर पाने में सक्षम होते हैं।

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ब्रिटेन के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा कार्यकारी (एचएसई) के दिशानिर्देशों के अनुसार, कार्यालयों में सीओ2 की मात्रा 1,000 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम) से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके इस स्तर पर पहुंचने से सिरदर्द, थकान और चक्कर जैसी परेशानी हो सकती है। यह गलत फैसला लेने की वजह बन सकता है। अध्ययन से पता चला है कि कुछ मामलों में घर के अंदर के पौधे एक घंटे से भी कम समय में कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता को 2000 पीपीएम से करीब 480 पीपीएम कर सकते हैं।

घर में लगाए जाने वाले लोकप्रिय पौधे जो कार्बन डाइऑक्साइड को प्रभावी ढंग से हटाते हैं, उनमें ब्लू स्टार फर्न (फ्लेबोडियम ऑरियम), वीपिंग फिग्स (फिकस बेंजामिना), ‘स्पाइडर’ पौधे (क्लोरोफाइटम कोमोसम) और एन्थ्यूरियम प्रजाति के पौधे (जैसे फ्लेमिंगो फूल) शामिल हैं।

बागवानी

पौधे शुरुआत से ही मानव समाज का केंद्र रहे हैं, लेकिन जिस तरह से हम पौधों का इस्तेमाल करते हैं और उनसे जुड़ते हैं वह पीढ़ी दर पीढ़ी और सभ्यताओं के जरिए बदला है। पुरापाषाण युग (11,000 साल पहले तक) के दौरान भोजन और दवा के लिए पौधों पर निर्भर होने से लेकर आज आधुनिक समाज ने कई तरह से पौधों के महत्व को समझने और उसको लेकर जागरूकता में कमी आई है।

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विश्व बैंक का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक 10 में से सात लोग शहरों में रह रहे होंगे और उनके प्राकृतिक वातावरण में पौधों तक पहुंच अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगी। हम प्रकृति से और अधिक दूर हो गए हैं। हालांकि 21वीं सदी की तमाम प्रौद्योगिकी, और आराम के सभी विकल्पों के बावजूद हम इससे अधिक दूर नहीं रह सकते।

मनुष्य ‘बायोफिलिया’ है, जिसका अर्थ है कि हम प्रकृति और पौधों के साथ संबंध तलाशने के लिए तैयार हैं। पौधे मनुष्य में ‘एंडोर्फिन’ जैसे खुशी के हार्मोन को बढ़ाते हैं। वे न केवल मानव प्रजातियों की तकदीर के साथ जुड़े हुए हैं बल्कि हमारे अस्तित्व में गहराई से निहित हैं। पौधों के आकार, रंग, गंध, स्पर्श और स्वाद से हमारा जीवन बेहतर हो सकता है…। हम सभी की अलग-अलग यादें और अनुभव होते हैं जो हमें पौधों से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए वह पौधा जो मुझे सबसे ज्यादा खुश करता है और मुझमें प्यार की गहरी भावना जगाता है, वह ‘क्रोकस सैटिवस’ है क्योंकि मैंने अपनी पहली बेटी का नाम इसके नाम पर (सैफरोन) रखा था।

कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान ब्रिटेन में पौधों की बिक्री में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई, क्योंकि लोगों ने अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए पौधों के महत्व को फिर से खोजना शुरू किया। 2021 में ब्रिटेन ने पौधों पर 7.6 अरब पौंड खर्च किए, जो पिछले दो वर्षों की तुलना में एक से दो अरब पौंड अधिक है। पौधे कोई विलासिता की वस्तु नहीं है। वे हमारे अस्तित्व का हिस्सा हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि ‘‘पौधे (प्लांट)’’ शब्द का अनुवाद कई देशी भाषाओं में ‘‘जो हमारी देखभाल करते हैं’’ के रूप में किया जाता है।

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