लेख – गठबन्धन की सरकार बनाम समझौते की सरकार

राजकुमार साहू
18वीं लोकसभा के चुनाव के बाद देश में एक बार फिर गठबन्धन की सरकार बनी है और इसके बाद सियासत भी तेज हो गई है. पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी एनडीए की गठबन्धन सरकार को लेकर विपक्ष लगातार इस बात को दोहरा रहा है कि गठबंधन की सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी. दूसरी ओर, एनडीए की तरफ से दावा किया जा रहा है कि सरकार स्थायी रहेगी और 5 साल चलेगी. इस बार के नतीजे के बाद एनडीए की सरकार तो बन गई है, लेकिन 4 सौ पार के नारे पर देश की जनता ने मुहर नहीं लगाई, वहीं इंडिया गठबन्धन इस लोकसभा चुनाव में मजबूत होकर उभरा है. यही वजह है कि इंडिया गठबन्धन से जुड़ी पार्टियों का उत्साह बढ़ गया है और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने को लेकर एनडीए गठबंधन भी ऊर्जा से लबरेज नजर आ रहा है. साथ ही, पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बाद लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनकर नरेंद्र मोदी ने भी इतिहास रचा है, लेकिन जिस तरह गठबन्धन सरकार को लेकर विपक्षी सवाल उठा रहे हैं और गठबन्धन सरकार का इतिहास भी अस्थिरता की रही है, उसके बाद चर्चा इस बात की भी है कि 2014, 2019 की एनडीए की सरकार के मुकाबले 2024 की एनडीए सरकार यानी मोदी 3.0 सरकार, समझौते की सरकार ना बन जाए, क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं है कि गठबन्धन की सरकार के फैसलों में समझौते करने पडते हैं.



देश में गठबन्धन की पुरानी सरकारों के कार्यकाल पर नजर डालें तो सरकार की अस्थिरता और फैसलों में आपसी समझौता की बातें जरूर समझ आएगी. यह बात सबको पता है कि जब कोई पार्टी अपने दम पर सरकार बनाती है तो अपने स्तर पर फैसले लेती है, लेकिन जब गठबन्धन की सरकार होती है तो स्वाभाविक तौर पर गठबन्धन की पार्टियों से मुद्दों और फैसलों पर राय जरूर लेनी पड़ती है. ये भी होता है कि फैसले में मनमुटाव हो, ऐसी स्थिति में फैसले नहीं हो पाते और इसका प्रभाव सीधे देश के विकास पर पड़ता है.

18 वीं लोकसभा के नतीजे की बात करें तो देश में एनडीए गठबन्धन को 293 सीट मिली है और इंडिया गठबन्धन को 234 सीट. पिछले लोमसभा चुनाव यानी 2019 में एनडीए 330 पार था. 2014 और 2019 यानी 10 साल तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को सहयोगी दल का उतना दबाव नहीं था, क्योंकि भाजपा अकेली ही बहुमत से अधिक सीटें जीतकर आई थी और पीएम नरेंद्र मोदी, उनकी टीम बड़े फैसले भी खुद ही लेती रही. 2024 की सरकार में हालात बदल गए हैं, एनडीए की सरकार तीसरी बार बनी है और नरेंद्र मोदी भी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनकर कीर्तिमान रच दिया है, लेकिन इस बार भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है और गठबन्धन की सहयोगी पार्टी मजबूत होकर उभरी हैं,

खसकर चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की पार्टी. ऐसे हालात और इस बार की गठबन्धन सरकार में पिछली 2 सरकार के मुकाबले पीएम नरेंद्र मोदी को सरकार चलाना आसान नहीं होगा. पीएम और भाजपा को सहयोगी दलों को अपने फैसले में शामिल करना होगा, सहमति लेनी होगी. ऐसी पहल नहीं करने पर मनमुटाव शुरू होगा और एनडीए में टकराहट बढ़ेगी, फिर ऐसी स्थिति में गठबन्धन सरकार का वही हश्र हो सकता है, जैसे पहले की गठबन्धन सरकारों के दौर में हुआ है. गठबन्धन की सरकार पर अस्थिरता की तलवार लटक जाएगी. निश्चित ही ऐसे हालात में गठबन्धन सरकार को चलाने या कहें, 5 साल खींचने के लिए समझौते करने पड़ेंगे. इस बात में दम इसलिए भी है कि पिछली गठबन्धन सरकारों में क्या-क्या हुआ, देश की जनता ने सब देखा है. कैसे सरकारें, वक्त के पहले औंधे मुंह गिर जाती हैं.

बड़ी बात यह है कि एनडीए गठबंधन में नीतिश कुमार की पार्टी है और यह सबको पता है कि उनकी कितनी बड़ी महत्वाकांक्षा रही है. वे प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, इसलिए वे एनडीए से अलग हुए थे और नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. हालांकि, वे बाद में फिर एनडीए में आ गए थे, लेकिन यह भी देश की जनता और भाजपा को पता है कि नीतिश कुमार कभी भी पलटी मार जाते हैं. वे अपने बयानों, अपने फैसलों से कितनी बाद पलटी मार चुके हैं, यह बात इतिहास में दर्ज चुका है. यदि हम कयासों की बात करें तो चंद्रबाबू नायडू की शपथ में नीतीश कुमार की गैर मौजूदगी को विपक्ष, एनडीए में शुरू हुई खटपट की ओर इशारा कर रहा है.

निश्चित ही, गठबन्धन की सरकार में समझौते तो करने पड़ते हैं. भले ही सत्ता में बैठी पार्टी या उनके नेता इस बात को ना स्वीकारें. पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने किस तरह 29 दलों को साथ लेकर गठबन्धन सरकार चलाई थी और विपरीत हालत में बेहतर सरकार चलाने का इतिहास भी रचा था, लेकिन यह भी जगजाहिर है कि उस गठबन्धन सरकार में समझौते भी हुए, क्योंकि गठबन्धन की सरकार में सहयोगी दल मनमानी पर उतर आते हैं. सरकार, उनकी बातों को दरकिनार करे तो सरकार अस्थिर होने का डर बना रहता है या कहें कि सरकार चली जाने की तलवार लटकती रहती है और इसी तलवार की धार के ऊपर खड़ा रहकर गठबन्धन सरकार में फैसले लेने पड़ते हैं.

देश में सबसे पहले 1977 में गठबन्धन की सरकार बनी थी और मोरारजी देसाई, पीएम बने थे. यह सरकार, पौने 2 साल चली थी. फिर 1980 में चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने थे. इसी तरह 1989 में वीपी सिंह, गठबन्धन की सरकार में पीएम बने थे, फिर चन्द्रशेखर पीएम बन गए थे. 1991 में पीवी नरसिम्हा राव जब गठबन्धन की सरकार में पीएम बने थे और किस तरह सहयोगी दलों पर इस सरकार निर्भर रहना पड़ता था, ये बातें भी इतिहास में दर्ज है. 1996 और 1998 के बीच देश ने गठबन्धन सरकार के चक्कर में 2 प्रधानमंत्री देखा था. 1998 से 2004 तक गठबन्धन सरकार बनी थी और पीएम बनकर अटलबिहारी वाजपेयी ने बखूबी सरकार चलाई थी. इसके बाद पिछले 20 साल तक देश में यूपीए की 2 बार और एनडीए की 2 बार सरकार रही और इन बरसों में सरकार में कांग्रेस, भाजपा मजबूत पार्टी रही. फैसले में भी उतने दबाव नहीं थे, लेकिन पिछली गठबन्धन की सरकारें, कैसे लुढ़क-लुढ़ककर दबाव में चलीं, इसका इतिहास गवाह है.

2024 में बनी गठबन्धन की सरकार को लेकर इसलिए भी चर्चा छिड़ गई है कि क्या एनडीए की यह सरकार यानी मोदी 3.0 सरकार, 5 साल चल पाएगी ? विपक्ष तो इस बात पर ज्यादा जोर दे रहा है और विपक्ष का दावा है कि पिछली गठबन्धन सरकार की तरह, यह गठबन्धन सरकार में अस्थिरता रहेगी. हालांकि, एनडीए गठबंधन सरकार में शामिल पार्टियों के नेताओं का साफ कहना है कि वे एक हैं और सरकार भी 5 साल चलेगी. अब देखना होगा, गठबन्धन सरकार का पुराना इतिहास एक बार फिर दर्ज होगा या फिर 2024 की गठबन्धन सरकार, उन मिथकों-धारणाओं को तोड़कर नया इतिहास रचेगी ?

( लेखक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार हैं )

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