Maha Shivratri 2022: यहां स्थित है एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर, भगवान भोलेनाथ का है बसेरा

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भक्त शिव मंदिरों व शिवालयों के दर्शन करने जाते हैं। शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए प्राचीन और पवित्र मंदिरों में पूजा अर्चना करते हैं। वैसे तो भारत में 12 ज्योतिर्लिंग और कई ऐतिहासिक शिवालय हैं, जहां आप शिवरात्रि, सावन या अन्य मौकों पर जा सकते हैं। कई स्थानों को लेकर मान्यता है कि वहां साक्षात महाकाल वास करते हैं। इन्हीं में से एक पवित्र शिव मंदिर हिमाचल प्रदेश में है। इस मंदिर की ऊंचाई बहुत ज्यादा है। इस कारण हिमाचल प्रदेश में स्थित शिव मंदिर को एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर कहा जाता है। इस महाशिवरात्रि आप एशिया के सबसे ऊंचे और पवित्र शिव मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं तो हिमाचल के जटोली मंदिर जा सकते हैं। इस मंदिर की कई खासियत हैं। जटोली शिव मंदिर अपनी शक्ति और चमत्कारों के लिए भी मशहूर है।



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हिमाचल प्रदेश में प्रसिद्ध शिव मंदिर

एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाने वाला जटोली मंदिर हिमाचल प्रदेश के सोलन शहर से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर भवन निर्माण कला का बेजोड़ नमूना है। हर साल महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। जटोली शिव मंदिर दक्षिण-द्रविड़ शैली से बनाया गया है।

जटोली शिव मंदिर की मान्यता 

इस मंदिर को तैयार करने में लगभग 39 साल लगे। मान्यता है कि भगवान शिव एक बार इस जगह पर आए थे और कुछ समय के लिए निवास किया था। बाद में इसी स्थान पर स्वामी कृष्णानंद परमहंस नाम के सिद्ध बाबा आकर तपस्या करने लगे। स्वामी कृष्णानंद परमहंस के मार्गदर्शन और दिशा निर्देश पर ही जटोली मंदिर का निर्माण कराया गया।

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जटोली शिव मंदिर की संरचना

जटोली मंदिर का गुंबद 111 फीट ऊंचा है। मंदिर में प्रवेश करने के लिए भक्तों को 100 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है। मंदिर के बाहरी ओर चारों तरफ कई देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। वहीं मंदिर के अंदर स्फटिक मणि शिवलिंग है। साथ ही भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती जी की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर के ऊपरी छोर पर 11 फुट ऊंचा विशाल सोने का कलश रखा हुआ है।

शिवजी ने जटोली में किया था त्रिशूल से प्रहार 

कहा जाता है कि इस स्थान पर पानी की समस्या हुआ करती थी। लोगों की इस समस्या को दूर करने के लिए स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने अपने त्रिशूल से उस स्थान पर जमीन पर प्रहार किया और वहां से पानी निकलने लगा। इसके बाद कभी भी लोगों को वहां पानी की कमी नहीं हुई।

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