जांजगीर-चाम्पा. दीपावली पर्व पर घर-आंगन को सजाने में पीले गेंदे के फूलों का विशेष महत्व रहा है. कभी खेतों की मेड़, बाड़ी, टिकरा और खुले स्थानों पर प्राकृतिक रूप से खिलने वाला जंगली पीला गेंदा आज धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच रहा है. इस पारंपरिक पौधे के संरक्षण और पहचान दिलाने के लिए बहेराडीह स्थित देश के पहले किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव ने महत्वपूर्ण पहल की है.
उनके प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तब मिली, जब भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण (PPV&FRA) ने 11 जुलाई 2024 को जंगली पीले गेंदा पौधे के लिए 2150 पंजीयन क्रमांक जारी किया.











उल्लेखनीय है कि इस पौधे के संरक्षण एवं पंजीयन के लिए दीनदयाल यादव ने 30 दिसंबर 2016 को आवेदन प्रस्तुत किया था. इस प्रक्रिया में कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग तथा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़ के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा के माध्यम से आवेदन किया गया था.
वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह के संचालक दीनदयाल यादव का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पीले जंगली गेंदा का दीपावली सहित विभिन्न पारंपरिक अवसरों पर सजावट के लिए उपयोग किया जाता रहा है. यह पौधा हमारी ग्रामीण संस्कृति, परंपरा और जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है. लेकिन बदलती खेती-किसानी, खरपतवार नियंत्रण और प्राकृतिक आवास में कमी के कारण इसकी उपलब्धता लगातार घट रही है.
उन्होंने कहा कि दीपावली जैसे पर्व पर जब हम फूलों से घर-आंगन सजाते हैं, तब हमें उन पारंपरिक जंगली फूलों और पौधों के संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए, जो हमारी पुरानी ग्रामीण संस्कृति की पहचान रहे हैं. किसान स्कूल की इस पहल का उद्देश्य केवल एक पौधे का पंजीयन कराना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पारंपरिक वनस्पतियों और जैव विविधता को सुरक्षित रखना भी है.



