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लेख – आखिर कॉन्वेंट कल्चर को बढ़ावा क्यों ?

श्रीया अग्रवाल
“भाषा अभिव्यक्ति का केवल साधन होनी चाहिए; साध्य नहीं।” किसी भाषा पर अच्छी पकड़ होना एक कौशल है तथा विविध भाषायी कौशल को निःसंदेह बढ़ावा भी देना चाहिए, किंतु किसी भाषा विशेष का ज्ञान है अथवा नहीं, इस बात को एकमात्र मापदंड मानते हुए किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व व योग्यता का आकलन करना, कहाँ तक उचित है?

प्रदेशभर में स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में शिक्षक भर्ती के आवेदन मंगाए जा रहे हैं। इसकी अर्हताओं में संबंधित विषय में स्नातक, स्नातकोत्तर तथा बी.एड. डिग्री के साथ ही आवेदनकर्ता की स्कूल से लेकर कॉलेज तक संपूर्ण शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से संपन्न होनी चाहिए। इसमें बाकी सभी अर्हताएं तो उचित प्रतीत होती हैं, किंतु अंग्रेजी में संपूर्ण शिक्षा के प्रावधान का औचित्य समझ से परे है। राज्य गठन के समय साक्षरता दर लगभग 65% थी। राज्य की अधिकांश युवा आबादी ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी है, जिनकी शिक्षा सरकारी एवं अन्य हिंदी माध्यम स्कूलों से पूर्ण हुई है, ऐसे में शिक्षण क्षेत्र में करियर निर्माण का स्वप्न देखने वाले युवाओं के साथ क्या यह भाषायी पक्षपात नहीं है?

क्या यह उस “मैकालियन मानसिकता” का प्रतीक नहीं है, जो केवल एक विदेशी भाषा में शिक्षित व्यक्ति को ही सर्वश्रेष्ठ और भारतीय भाषा में शिक्षित व्यक्ति को दोयम दर्जे का समझती है। अध्यापन हेतु किसी भी विषय की गहराई से समझ कितनी है; ये अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए या उस विषय की शिक्षा किस माध्यम से हुई है, इसका महत्व ज्यादा है? एक क्षण के लिए यह माना जा सकता है कि स्कूल अंग्रेजी माध्यम का है, तो शिक्षकों के लिए अंग्रेजी भाषा के ज्ञान का परीक्षण अनिवार्य है, किंतु इस बात की परीक्षा अन्य तरीक़े से भी तो ली जा सकती है।

क्या इस तरह की अनिवार्यता रखना उस अभ्यर्थी के साथ अन्याय नहीं है, जो अन्य सभी अर्हताएं रखता है तथा किसी कॉन्वेंट स्कूल के विद्यार्थी से कहीं अधिक योग्य भी है, किंतु सामाजिक-पारिवारिक या आर्थिक परिस्थितियों के चलते उसकी पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम में संपन्न न हो सकी। क्या यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14,15,16 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार को सीमित नहीं करता? हालांकि संविधान में यह भी वर्णित है राज्य चाहे तो किसी रोजगार के लिए विशेष योग्यता की शर्त रख सकता है, किंतु इस प्रकार की शर्तें रखना क्या संवैधानिक मूल्यों के अनुकूल है, जो किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर तरज़ीह दे कि उसकी शिक्षा एक विशेष माध्यम में हुई है? यह न केवल भाषाई अभिजात्यता का परिचायक है, अपितु ग्रामीण-शहरी तथा अमीर-गरीब विद्यार्थियों के बीच की खाई को और चौड़ा करने का भी प्रयास है।

सक्षम घरों के महंगे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़े बच्चों के पास केवल अंग्रेजी का ज्ञान हो, चाहे अन्य विषयों का ज्ञान न हो या अल्प हो, भले ही अन्य योग्यताओं का स्तर कम हो, तो भी उनका स्वागत है। किंतु निर्धन परिवारों के बच्चे, जो अन्य सभी विषयों में कितने ही पारंगत हों, केवल अंग्रेजी का ज्ञान अल्प होने के कारण; अधिक योग्य होने के बावजूद भी रोजगार के अवसर से वंचित रह जाएंगे। आखिर होनहार होने की यह कैसी कसौटी है, जो कॉन्वेंट कल्चर को बढ़ावा देने पर आधारित है?

वर्तमान समय की मांग है कि अंग्रेजी का ज्ञान रोजगार प्राप्ति के अवसरों को बढ़ाने के लिए आवश्यक है और इसे सीखने-बढ़ावा देने में कोई आपत्ति नहीं है। “समस्या अंग्रेजी से नहीं; अंग्रेज़ियत से है”, जो इस वैचारिकता का शिकार है कि तुम्हें अंग्रेजी नहीं आती, मतलब कुछ नहीं आता। यूं तो 75 वर्ष होने को आए भारत को आजाद हुए, कहने के लिए हम इस वर्ष आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, किंतु इस तरह के प्रावधानों को देखकर लगता है जैसे आज भी हम भाषायी स्तर पर अंग्रेजों के गुलाम ही हैं। एक ओर तो प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस मनाकर हम भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात करते हैं, तो दूसरी ओर अंग्रेजी को सर्वश्रेष्ठता का पैमाना मानकर युवा पीढ़ी को हमारी समृद्ध भाषायी-सांस्कृतिक विरासत से दूर करने का प्रयास भी बखूबी कर रहे हैं।

देश के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान- आई.आई.टी., आई.आई.एम., एम्स तथा सिविल सेवा जैसी प्रतियोगी परीक्षा लेने वाली संस्थाएं भी इस प्रकार की अर्हताएं नहीं रखते कि जिनकी शिक्षा शुरु से आखिर तक केवल अंग्रेजी में हुई है, वही आवेदन करें। तो फिर आत्मानंद स्कूलों में शिक्षक भर्ती के लिए ऐसी अनिवार्यताएं रखकर हम उस सामाजिक न्याय के आदर्शात्मक लक्ष्य तक भला किस प्रकार पहुंचेंगे, जिसका स्वप्न हमारे संविधान निर्माताओं; विशेषतः बाबासाहेब अंबेडकर ने देखा था, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि के शोषित-वंचित वर्ग को समान अवसर प्रदान करे, उन्हें साथ लेकर चले, वह भी बिना किसी भाषायी या वैचारिक भेदभाव किए?

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