Baheradih News : सती का चरित्र सच्चे प्रेम, निष्ठा व आत्म बलिदान का प्रतीक,, पं मिश्रा, ग्राम बहेराडीह में श्रीमद भागवत कथा के तीसरे दिवस सती चरित्र का वर्णन

चाम्पा. जहाँ भगवान का अपमान हो, वहाँ रहना या मौन रहना अधर्म है। सती का चरित्र सच्चे प्रेम, निष्ठा और आत्म बलिदान का प्रतीक है। चुंकि शिव और शक्ति एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। वे सृष्टि के संतुलन के दो रूप हैं।

 



उक्त बातें ग्राम बहेराडीह स्थित माँ दुर्गा चौक में यादव परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद भागवत कथा ज्ञान यज्ञ कार्यक्रम के तीसरे दिवस सती चरित्र कथा का वर्णन करते हुये कथा वाचक पंडित उत्तम मिश्रा ने ब्यक्त किया। उन्होंने सती की जन्म की कथा के बारे में बताया कि सती का जन्म दक्ष प्रजापति और प्रसूति देवी के घर हुआ। दक्ष ब्रम्हा जी के मानस पुत्र थे। सती वास्तव में भगवान श्री विष्णु की बहन और आदि शक्ति का अवतार थीं।

उनका उद्देश्य था कि भगवान शिव से विवाह कर सृष्टि के संतुलन की स्थापना करना। कथा वाचक पं मिश्रा ने कहा कि जन्म से ही सती भगवान शिव की भक्ति करतीं थीं और उनके ध्यान में लीन रहतीं थीं। उन्होंने सती का शिव से विवाह का वर्णन करते हुये कहा कि दक्ष प्रजापति को भगवान शिव का वैराग्य और अलौकिक स्वरूप पसंद नहीं था। वे उन्हें असभ्य और गृहस्थ जीवन के योग्य नहीं मानते थे। लेकिन सती का मन केवल भगवान शिव में ही समर्पित थीं। उन्होंने सैकड़ों वर्षो तक कठोर ब्रत रखकर शिव को प्रसन्न किया। शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और सती से विवाह करने का वचन दिया। इसके बाद हिमालय के निकट भब्य विवाह समारोह में सती और शिव का दिब्य विवाह सम्पन्न हुआ। इस विवाह में देवता, ऋषि, गन्धर्व और समस्त लोक उपस्थित हुये। सम्पूर्ण ब्रह्मांड ने इस दिब्य मिलन का उत्सव मनाया। कथा में कथा वाचक पं मिश्रा ने दक्ष का अहंकार और यज्ञ का वर्णन किया। सती का पुनर्जन्म की कथा पर प्रकाश डालते हुये कहा कि जहाँ पर भगवान का अपमान होता है। वहाँ रहना या मौन रहना अधर्म है। वहीं सती का चरित्र सच्चे प्रेम, निष्ठा और आत्मा बलिदान का प्रतीक माना गया है। चूंकि शिव और शक्ति एक दूसरे के बिना अधूरा है।

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कथा वाचक पं मिश्रा ने गृहस्थ आश्रम सभी आश्रमों का आधार है। क्योंकि गृहस्थ ही समाज को अन्न, धन और सहायता प्रदान करता है। यहीं आश्रम कर्तब्य प्रेम, सेवा और धर्म पालन का केंद्र ही ब्राम्हचार्य, वानप्रस्थ, सन्यास आश्रम सभी से चारों आश्रम गृहस्थ आश्रम पर ही निर्भर हैं। संसार सिर्फ दुखालय है।
कथा श्रवण करने वालों में नन्दलाल यादव, लक्ष्मीन यादव,सियाराम यादव,शिवराम कश्यप, श्याम कंवर, रामकली यादव, घनश्याम यादव,सुभाष यादव, उमेश यादव, राजकुमार यादव, लखन यादव, रामधन यादव, बलराम यादव, समेत अंचल के ग्रामीण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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