CG News : एक व्यवसायी से साहित्य साधक तक : छत्तीसगढ़ी में श्रीमद्भगवद्गीता रचकर रविन्द्र कुमार सोनी “भारत” ने रचा नया इतिहास, CM को भेंट की गई…

रायपुर. जब संकल्प दृढ़ हो, आस्था अटूट हो और उद्देश्य समाज की सेवा हो, तब साधारण व्यक्ति भी असाधारण कार्य कर सकता है। इसका जीवंत उदाहरण हैं छत्तीसगढ़ सिल्वर होलसेल एसोसिएशन के सदस्य एवं चांपा के साहित्य साधक रविन्द्र कुमार सोनी “भारत”, जिन्होंने वर्षों की तपस्या और अथक परिश्रम से “छत्तीसगढ़ी श्रीमद्भगवद्गीता” की रचना कर छत्तीसगढ़ी भाषा और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

 



चांदी व्यवसाय से जुड़े रविन्द्र कुमार सोनी “भारत” का मानना है कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जीवन का मार्गदर्शक है। उनके मन में लंबे समय से यह विचार था कि छत्तीसगढ़ के सामान्य जन, विशेषकर ग्रामीण अंचलों के लोग, अपनी मातृभाषा में गीता के संदेश को सरलता से पढ़ और समझ सकें। इसी विचार ने एक संकल्प का रूप लिया और उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में श्रीमद्भगवद्गीता को प्रस्तुत करने का कठिन दायित्व अपने ऊपर लिया।

यह कार्य आसान नहीं था। एक छोटे से चांदी कारीगरी से अपना सफर शुरू करते हुए तमाम व्यापारिक व्यस्तताओं, पारिवारिक दायित्वों और जीवन के अनेक उतार-चढ़ावों के बीच उन्होंने 25 वर्षों तक निरंतर अध्ययन और लेखन का कार्य जारी रखा। इसी बीच इन्हें एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन iskcon की कुछ अन्य बुकों का भी छत्तीसगढ़ी में अनुवाद करने का गौरव प्राप्त हुआ है. सन 2006 में अंतर्राष्ट्रीय संगठन iskcon द्वारा प्रकाशित इनकी पहली छत्तीसगढ़ी बुक भागवत के अंजोर ही छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा घोषित करवाने का एक माध्यम भी बना था. तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह द्वारा इस बुक को भी सराहा जा चुका हैं. लेखक के लिए इसी कड़ी में एक और ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक के मूल भाव को सुरक्षित रखते हुए उसे सहज, सरल और आत्मीय छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रस्तुत करना उनके लिए एक साधना के समान था।

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आज उनकी यह कृति केवल एक पुस्तक नहीं रह गई है, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के संवर्धन का एक अभियान बनती जा रही है। समाज के विभिन्न वर्गों से उन्हें निरंतर सराहना और समर्थन प्राप्त हो रहा है।
इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ सिल्वर होलसेल एसोसिएशन, जिसकी सदस्यता स्वयं रविन्द्र कुमार सोनी “भारत” के पास भी है, ने इस पुस्तक के व्यापक प्रचार-प्रसार का दायित्व अपने ऊपर लेने का निर्णय लिया है। संस्था का मानना है कि यह कृति केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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छत्तीसगढ़ सिल्वर होलसेल एसोसिएशन का संकल्प :
एसोसिएशन चाहता है कि यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के प्रत्येक घर, विद्यालय, महाविद्यालय और पुस्तकालय तक पहुँचे, ताकि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और भारतीय संस्कृति से और अधिक जुड़ सके।
समाज से वे मातृभाषा के सम्मान और आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाने की अपील करते हैं। वहीं सरकार से उनकी विनम्र अपेक्षा है कि छत्तीसगढ़ी साहित्य को अधिक प्रोत्साहन मिले तथा मातृभाषा में लिखी गई महत्वपूर्ण कृतियों को शैक्षणिक संस्थानों और पुस्तकालयों तक पहुँचाने की व्यवस्था की जाए।
रविन्द्र कुमार सोनी “भारत” कहते हैं—
“मैं स्वयं को कोई बड़ा विद्वान नहीं मानता। मैं भगवान श्रीकृष्ण का एक साधारण सेवक हूँ। मेरी यह कृति प्रसिद्धि या पुरस्कार के लिए नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी के माध्यम से गीता के दिव्य संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।”
“यदि मेरी छत्तीसगढ़ी श्रीमद्भगवद्गीता किसी एक व्यक्ति के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सके, उसे सही मार्ग दिखा सके और उसके भीतर आशा का दीप जला सके, तो मैं अपने जीवन की साधना को सफल मानूँगा।”
वे आगे कहते हैं कि गीता के उपदेशों ने उनके जीवन के कठिन समय में उन्हें शक्ति और धैर्य प्रदान किया। भगवान श्रीकृष्ण के कर्मयोग के सिद्धांत – “कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो” – को उन्होंने अपने जीवन का आधार बनाया और उसी प्रेरणा से यह महान कार्य पूर्ण कर सके।

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