अकलतरा. श्री ऋषभ विद्योदय महाविद्यालय, बनाहिल में हिन्दी साहित्य के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्म जयंती पर “भारत में संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी चुनौतियां और संभावनाएं” विषय पर संगोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के पूजन एवं दीप प्रज्वलन से हुआ. तत्पश्चात उपस्थित अतिथियों, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों द्वारा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के विचारों का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया.








संगोष्ठी के प्रथम सत्र में अरविन्द सर ने रामधारी सिंह दिनकर के साहित्यिक व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे हिन्दी साहित्य के ऐसे सशक्त रचनाकार थे, जिनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम, वीरता, स्वाभिमान, सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और भारतीय संस्कृति का प्रभावशाली समन्वय मिलता है. उनकी प्रमुख कृतियों – ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘उर्वशी’, ‘हुंकार’ तथा ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ का उल्लेख करते हुए विद्यार्थियों को उनके साहित्य की विशेषताओं से अवगत कराया गया. जिसमें विशेष रूप से ‘रश्मिरथी’ के कर्ण के चरित्र के माध्यम से दिनकर जी की सामाजिक दृष्टि, संघर्षशील चेतना और मानवीय मूल्यों को समझाया. उनकी ओजपूर्ण काव्य-भाषा और राष्ट्रीय चेतना ने हिन्दी साहित्य में उन्हें विशिष्ट स्थान प्रदान किया है. विद्यार्थियों ने भी रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं का पाठ करते हुए उनके साहित्य के प्रति अपनी अभिरुचि व्यक्त की.
सत्र के द्वितीय सत्र में हिन्दी के समक्ष उपस्थित विभिन्न चुनौतियों पर भी गंभीरता से विचार किया गया. संस्था के संचालक डॉ जे के जैन ने आज के संगोष्ठी के विषय पर विचार रखते हुवे कहते हैं की भारत की भाषायी विविधता, अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव, तकनीकी एवं डिजिटल क्षेत्र में भाषायी आवश्यकताओं, उच्च शिक्षा में हिन्दी के सीमित प्रयोग तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं के साथ समन्वय पर विचार रखे. आगे डॉ. जेके जैन ने हिन्दी की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया, सिनेमा, पत्रकारिता, अनुवाद, रोजगार, शिक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे नए क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग का विस्तार हो रहा है.
तकनीकी शब्दावली के विकास, गुणवत्तापूर्ण हिन्दी सामग्री के निर्माण और भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद की सुविधाओं को बढ़ावा देकर हिन्दी की उपयोगिता को और व्यापक बनाया जा सकता है.
कार्यक्रम का तृतीय सत्र प्रश्नोत्तरी का रखा गया जिसमें संगोष्ठी में विद्यार्थियों ने भी सक्रिय सहभागिता करते हुए हिन्दी के वर्तमान स्वरूप, उसकी उपयोगिता तथा भविष्य की संभावनाओं से संबंधित प्रश्न प्रस्तुत किए. प्रश्नोत्तर सत्र में वक्ताओं ने विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया और उन्हें भाषा के प्रति सकारात्मक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया.
कार्यक्रम के अंत में हिन्दी को संवाद, ज्ञान और संस्कृति के सशक्त माध्यम के रूप में विकसित करने तथा भारत की सभी भाषाओं के सम्मान के साथ भाषायी समन्वय को बढ़ावा देने का संदेश दिया गया. आभार प्रदर्शन के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ. इस कार्यक्रम में संस्थान के संचालक डॉ जे के जैन एवं महाविद्यालय के प्राध्यापकगण अरविन्द कुमार, दुर्गा टण्डन, राहुल राठौर,अनुज जैन, संध्या सिंह, सरिता पटेल, चंद्ररुपा कश्यप, संदीप कुर्रे, अशोक पाण्डेय, अनामिका सिंह, सुनीता पाण्डेय, पायल दास, रश्मि मरकाम, समरीन मिर्जा, राजेश, भास्कर कश्यप, विद्या जायसवाल, अविनाश चौहान, नरेंद्र पाटले, मनीष गंधर्व, आकाश दास, नीरज निर्मलकर, बृजनंदन पटेल एवं द्वाशराम कश्यप सहित राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवक, एनसीसी कैडेट्स तथा महाविद्यालय के समस्त छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे.



