वेदों और ग्रंथों में है राष्ट्र का जयगान, जानें-इसके बारे में सबकुछ

राष्ट्र की उन्नति का चौथा आधार उग्र है। उग्र तेज के अर्थ में प्रयोग होता है। यह उग्रता सात्विक और निर्माण करने वाली होनी चाहिए, विनाश करने वाली नहीं। कार्य जब जोश व होश के साथ किया जाता है, तब वह सफल होता है। तेजस्विता राष्ट्र रक्षा, संस्कृति व धर्म की रक्षा का आधार है। दीक्षा का अर्थ वेद में व्रत या संकल्प बताया गया है। किसी शुभ कार्य या उद्देश्य के लिए समर्पित हो जाना। जब पक्का संकल्प किया जाए तो वह दीक्षा है। तप राष्ट्र की महान शक्ति और आधार है। वेद के अनुसार, अच्छे उद्देश्य के लिए दुख सहना तप है। राष्ट्र की उन्नति के लिए नागरिकों में तप की भावना हो। महाभारत में कहा गया है- तप: स्वकर्म वर्तित्वम् और तप: स्वधर्म वर्तित्वम्। यानी हर व्यक्ति को अपने कर्तव्य को पूरी प्रवणता के साथ करना चाहिए। यही तप है।



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वेद में ब्रह्म यानी ज्ञान-विद्या को भी राष्ट्र का आधार माना गया है। एक सक्षम राष्ट्र वह होता है, जहां ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो। ब्रह्म का प्रयोग ज्ञान और विद्या के साथ मंगलविधान को बताता है। यानी ज्ञान-विद्या के साथ उसका मांगलिक इस्तेमाल हो, किसी विनाश में नहीं। राष्ट्र का आठवां आधार यज्ञ को माना गया है। वैदिक दर्शन में शुभ संकल्प के साथ किए जाने वाले कर्म यज्ञ कहे जाते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-नायं

लोकोस्त्ययज्ञस्य कुतोन्य: कुरुसत्तम। यानी यज्ञ से रहित को लोक या परलोक कुछ भी नहीं मिलता। वेद में देवपूजा यानी पूजनीयों का पूजन करना, संगतिकरण यानी विभिन्न वगोर्ं का समन्वय और दान यानी राष्ट्र के लिए नि:स्वार्थ त्याग करना। महर्षि दयानंद ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है- राष्ट्र में तरह-तरह के यज्ञ होते हैं, जिन्हें कर्तव्य मानकर करने से राष्ट्र विकास के रास्ते पर बढ़ता है। वैदिक राष्ट्रवाद ऐसी विचारधारा है, जो राष्ट्र के हर व्यक्ति की उन्नति के लिए प्रेरणा देती है, जहां न तो वर्ण व वर्ग का भेद है, न अन्य कोई संकुचित भावना।
सनातन संस्कृति
अखिलेश आर्येन्दु
वैदिक वांङ्गमय के अध्येता

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