दिल्ली हाईकोर्ट ने बाबा रामदेव को भेजा नोटिस, इससे से जुड़े मामले में डॉक्टरों की याचिका पर मांगा जवाब…

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ‘कोरोनिल’ के उपयोग को लेकर बाबा रामदेव के खिलाफ डॉक्टरों के विभिन्न संगठनों द्वारा दायर मुकदमों पर छह अक्टूबर को सुनवाई करेगी। अदालत ने बाबा रामदेव से कहा कि वह डॉक्टरों के संगठनों की याचिकाओं पर जवाब दायर करें, जिनमें कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित कथित रूप से समान याचिकाओं के कारण यहां सुनवाई नहीं रुकनी चाहिए। कोरोनिल पतंजलि आयुर्वेद द्वारा विकसित एक दवा है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवाई के रूप में सरकार के पास पंजीकृत है।

 



 

 

 

जस्टिस अनूप जयराम भम्भानी ने गुरुवार को प्रतिवादियों रामदेव, पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड और अन्य को वादियों (डॉक्टरों के संगठन) द्वारा दी गई अर्जियों पर नोटिस जारी किया और कहा कि मैं आपको कुछ समय दूंगा। हमें (सुप्रीम कोर्ट में लंबित) रिट याचिका को देखना होगा। मैं आपके मामले पर किसी और दिन संक्षिप्त सुनवाई करूंगा।

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अदालत ने आदेश दिया

बात यह है कि वादी 26 अगस्त के आदेश पर स्पष्टीकरण चाहते हैं। उनका कहना है कि आदेश में दिए गए निर्देशों के कारण आधी सुनवाई के बाद इस मामले पर आगे की सुनवाई नहीं रुकनी चाहिए। नोटिस जारी करें। अगली तारीख से पहले अर्जियों पर जवाब दाखिल होने दें।”

 

 

 

डॉक्टरों ने रामदेव पर लगाया था लोगों को गुमराह करने का आरोप

गौरतलब है कि डॉक्टरों के कई संगठनों/एसोसिएशन ने पिछले साल हाईकोर्ट में अर्जी देकर आरोप लगाया था कि रामदेव बहुत हद तक लोगों को गुमराह कर रहे हैं कि कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की मौत के लिए एलोपैथी जिम्मेदार है और दावा कर रहे हैं कि पतंजलि का कोरोनिल कोविड का इलाज है।

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वादियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने दलील दी कि वहां सुनवाई कब होगी इस पर किसी का वश नहीं है और सुप्रीम कोर्ट में तारीख कंप्यूटर से तय होती है, सुप्रीम कोर्ट में किसी अन्य द्वारा दायर याचिकाओं के कारण हाईकोर्ट में सुनवाई नहीं रुकनी चाहिए।

 

 

प्रतिवादियों में से एक पतंजलि की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इन्द्रबीर सिंह ने कहा कि उसने मौजूदा सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाने के लिए आवेदन दे दिया है और उससे जल्दी ही सूचीबद्ध होने की संभावना है।

 

 

 

गौरतलब है कि अदालत ने 26 अगस्त को मौखिक आदेश में कहा था कि न्यायिक औचित्य और अनुशासन के अनुसार तो सुप्रीम कोर्ट में कथित रूप से समान मुद्दे पर लंबित याचिकाओं पर कुछ स्पष्ट होने तक उसे अपने समक्ष होने वाली सुनवाई पर नियंत्रण रखना चाहिए।

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